कांग्रेस अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया की सिर्फ ये दो बातें मान लेती तो सरकार जाने की नौबत ना आती


ज्योतिरादित्य सिंधिया. कांग्रेस के दिग्गज नेता जो अब बीजेपी के हो गए. होली के दिन उन्होंने 18 साल बाद कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया. हालांकि औपचारिक ऐलान होना बाकी है. होली की सुबह पहले उन्होंने अमित शाह से मुलाकात की. इसके बाद वह शाह के साथ पीएम मोदी से मिले. फिर ट्वीट कर अपने इस्तीफे की खबर मीडिया को दी. हालांकि जो लेटर उन्होंने ट्वीट किया, उस पर 9 मार्च यानी एक दिन पहले का डेट लिखा था. सिंधिया ने होली से एक दिन पहले ही अपना इस्तीफा टाइप कर लिया था.








अब खबर आ रही है कि बीजेपी उन्हें राज्यसभा भेज सकती है. केंद्र में मंत्री बनाया जा सकता है. सिंधिया के इस फैसले से उनके समर्थक खुश हैं, कि उनके महाराज राज्यसभा जाएंगे. केंद्र में मंत्री बनेंगे. लेकिन बीजेपी में शामिल होने से पहले सिंधिया के समर्थक चाहते थे कि उनके नेता को कांग्रेस राज्यसभा भेजे. साथ ही उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए. मध्य प्रदेश में कमलनाथ मुख्यमंत्री के साथ-साथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी थे. सिंधिया न तो सांसद थे और न विधायक. और ना ही उन्हें संगठन में कोई पद मिला था. लोकसभा में गुना से हार गए थे. बीजेपी के केपी यादव से. लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें कांग्रेस वेस्ट यूपी का प्रभारी बनाया गया था,  लेकिन खराब प्रदर्शन के बाद उन्होंने कांग्रेस के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था.


क्या चाहते थे सिंधिया?


चाहते तो बहुत कुछ थे. कांग्रेस के जीतने के बाद सीएम पद, लेकिन नहीं मिला. फिर प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते थे वो भी नहीं मिला. फिर राज्यसभा सांसद की बारी आई. कांग्रेस उन्हें सेफ सीट देने की बजाय चुनाव लड़वना चाहती थी.


मध्य प्रदेश में राज्यसभा की कुल 11 सीटें हैं. इस समय बीजेपी के पास 8 और कांग्रेस के पास 3 सीटें हैं. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया का कार्यकाल खत्म हो रहा है. 9 अप्रैल को. प्रदेश में राज्यसभा की इन तीनों सीटों पर 26 मार्च को चुनाव होना था.


होली के दिन हुए वाकये से पहले मध्य प्रदेश की 230 सदस्यों वाली विधानसभा में 228 थे. दो विधायकों के निधन से दो सीटें खाली थीं. राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के दो प्रत्याशियों को विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के हिसाब से 115 विधायकों का समर्थन चाहिए था, जिसमें कांग्रेस को निर्दलीय विधायक और मंत्री प्रदीप जायसवाल समेत 2 विधायकों की जरूरत होती. वहीं, बीजेपी को चुनाव में दूसरे प्रत्याशी को जिताने के लिए अपने विधायकों के अलावा 9 अन्य विधायक के वोटों की जरूरत होती.


बीजेपी और कांग्रेस दोनों एक-एक राज्यसभा सांसद आसानी से भेज सकते थे. लेकिन बीजेपी ने ऐलान कर दिया था कि वह दो सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. मीडिया में ऐसी खबरें आईं कि कांग्रेस सेफ सीट दिग्विजय सिंह को देना चाहती है. वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव में उतरना पड़ता. क्रॉस वोटिंग होती तो सिंधिया हार भी सकते थे.


एक दिन पहले जब सीएम कमलनाथ से पूछा गया था कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया राज्यसभा जा रहे हैं तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था. इसके एक दिन बाद ही खेल हो गया


अब बीजेपी में शामिल होने के बाद सिंधिया राज्यसभा भी जाएंगे. और मंत्री भी बनेंगे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें मंत्रिमंडल विस्तार के समय कोई मंत्री पद दिया जा सकता है.


हालांकि सिंधिया मंत्री रह चुके यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकार में. अब बीजेपी की तरफ से मंत्री बन सकते हैं.


मध्य प्रदेश में कमलनाथ और सिंधिया में नहीं बनती. बनती भी कैसे. महाराज के होते हुए कमलनाथ सीएम बन गए थे. ये बात सिंधिया और उनके समर्थकों को पसंद नहीं आई. उस समय लोगों ने चुप्पी साध ली. इस उम्मीद में की वक्त के साथ चीजें ठीक हो जाएंगी. लेकिन ठीक होने की बजाय चीजें और बिगड़ती चली गईं. और आज लगभग 15 महीने पुरानी सरकार जा रही है. तो उसकी एक वजह सिंधिया भी हैं. या यू कहें कि कमलनाथ भी.