कोरोना हो या इबोला, दुनिया को याद आता है क्यूबा, क्या है इस देश के पास कि चीन, इटली, ब्रिटेन ने फैला दिए हाथ

कम्युनिस्ट-शासित क्यूबा इन दिनों कोरोनावायरस से पीड़ित मुल्कों के लिए फरिश्ता साबित हो रहा है. कोरोना की सबसे ज़्यादा मार झेल रहे इटली की म...


कम्युनिस्ट-शासित क्यूबा इन दिनों कोरोनावायरस से पीड़ित मुल्कों के लिए फरिश्ता साबित हो रहा है. कोरोना की सबसे ज़्यादा मार झेल रहे इटली की मदद के लिए क्यूबा ने अपने डॉक्टरों और नर्सों की एक टीम रवाना कर दी है. इटली में इस बीमारी से सबसे बुरी तरह प्रभावित प्रांत लॉम्बार्डी में त्राहिमाम की स्थिति है. जब स्थानीय प्राधिकरणों से स्थिति नहीं संभली और लॉम्बार्डी में पानी सर के ऊपर निकल गया तो उसने क्यूबा से मदद की मांग की. अंतरराष्ट्रीय मेडिकल प्रतिबद्धताओं के प्रति सबसे ज़्यादा समर्पित क्यूबा ने फौरन हामी भरते हुए इतिहास में पहली बार इटली में अपने डॉक्टरों-नर्सों की टीम रवाना कर दी.



मामला सिर्फ़ इटली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसी महीने की 12 तारीख़ को बहामास के पास हज़ार यात्रियों से लदा एक ब्रिटिश क्रूज़ बीच समंदर में संकट में फंस गया.


शिप में मौजूद कम से कमस 50 यात्रियों और क्रू मेंबर्स में कोरोनावायरस के लक्षण देखे गए. ख़बर फैलने के बाद पूरे क्रूज़ में लोगों की हवाइयां उड़ गईं. जिस बहामास के लिए ये क्रूज़ रवाना हुआ था, उसने दो टूक कह दिया कि वो अपने किसी भी बंदरगाह पर इसे आने नहीं देगा.


ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने लाख कोशिश कर ली, लेकिन बहामास टस से मस नहीं हुआ. बाक़ी देशों से भी बात की गई, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ. आख़िरकार क्यूबा को याद किया गया और क्यूबा ने एमएस ब्रीमर नामक इस जहाज़ को न सिर्फ़ पनाह दी, बल्कि उसमें मौजूद सभी यात्रियों और क्रू मेंबर्स के इलाज का भी ज़िम्मा संभाल लिया. समंदर में एक हफ़्ते भटकने के बाद 18 मार्च को ये जहाज़ क्यूबा में किनारे लगा. इसके बाद जांच-परीक्षण करके 1000 से ज़्यादा यात्रियों को क्यूबा के अधिकारियों ने विशेष बस में बैठाकर एयरपोर्ट पहुंचाया और उन्हें वापस ब्रिटेन भेज दिया.



 क्यूबा ने इस क्रूज़ को बचाया, लोग शुक्रिया कह रहे हैं



ख़ुद क्यूबा भी कोरोना की चपेट में, लेकिन दूसरों की कर रहा है मदद


ऐसा नहीं है कि है कि क्यूबा में कोरोनावायरस का कोई कोई मामला ही नहीं है और इसलिए वो घूम-घूमकर दूसरों की मदद कर रहा है. दुनिया के बाक़ी मुल्कों की तरह क्यूबा भी इस समय कोरोनावायरस से लड़ रहा है. जिस वक़्त क्यूबा ब्रिटिश शिप की मदद कर रहा था उसी वक़्त क्यूब में इटली के तीन पर्यटक कोरोनावायरस का इलाज करवा रहे थे. बाद में उनमें से एक की मौत हो गई.


सरकार ने वहां हर तरह के सांस्कृतिक और खेल आयोजनों को पूरी तरह बंद कर दिया. राष्ट्रपति मिगुल डायज़-कैनल ने इसके बाद विदेशियों के लिए अपनी सीमा सील कर दी. सरकारी वेबसाइट के मुताबिक़ रविवार दोपहर तक इस देश में कोरोनावायरस से कुल 35 मामलों की पुष्टि हुई है. 954 मरीजों को निगरानी में रखा गया है, जिनमें 255 विदेशी और 727 स्थानीय लोग शामिल हैं.


क्यूबा इस मामले में ज़रा भी ढिलाई नहीं बरत रहा है. जिस व्यक्ति पर भी शक है, उसकी पूरी जांच की जा रही है. सरकार के मुताबिक़, इस वक वक़्त 30,773 लोगों को उनके घरों में क्वारंटाइन किया गया है और उनकी सघन निगरानी की जा रही है.


 



क्यूबा की जादुई दवाई


मेडिकल में क्यूबा के योगदान का कोई मुक़ाबला नहीं है. अंतरराष्ट्रीय आपातकाल से लड़ने के लिए ये देश हमेशा आगे आया है. क्यूबन बायोटेक उद्योग ने इंटरफेरॉन अल्फ़ा 2बी नामक दवाई बनाई है जिसे इम्यून सिस्टम को मज़बूत करने में बेहद कारगर बताया जा रहा है. इससे पहले डेंगू, एचआईवी जैसी गंभीर बीमारियों में इस दवा का व्यापक पैमाने पर पूरी दुनिया में इस्तेमाल हुआ है.


 


क्यूबा में पाबंदी बढ़ाई गई


चीन में जब कोरोनावायरस का ख़तरा बेहद गंभीर हो गया तो उसने क्यूबा से यही दवाई मंगवाई थी. बाक़ी कई देश भी क्यूबा से ये दवाई ले रहे हैं. 2014-2016 में जब अफ्रीकी देशों पर इबोला का कहर बरपा था तो क्यूबा ने पश्चिमी अफ्रीकी देशों में अपने डॉक्टरों की पूरी फौज उतार दी थी. उससे पहले हैती में हैजा के ख़िलाफ़ क्यूबा ने जिस तरह का काम किया, उसकी पूरी दुनिया ने सराहना की थी. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संकट के प्रति अपनी मज़बूत प्रतिबद्धता के कारण क्यूबा अपनी आज़ादी के बाद से ही ऐसा करता रहा है.



अब इटली की बारी


इटली को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए यूरोप के सबसे अच्छे देशों में गिना जाता है. लेकिन, कोरोनावायरस पर नकेल कसने में इटली बुरी तरह नाकाम हुआ है. क्यूबा ने वहां 52 सदस्यों की टीम भेजी है. ये पहली दफ़ा है जब क्यूबा इटली की मदद के लिए जा रहा है. कोरोनावायरस फैलने के बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजी जाने वाली क्यूबा की ये छठी टीम है.


इटली से पहले क्यूबा के डॉक्टर्स वेनेज़ुएला, निकारागुआ, जमैका, सूरीनाम और ग्रेनेडा में जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं. आईसीयू के विशेषज्ञ 68 वर्षीय डॉक्टर लियोनार्डो फर्नांडीज़ ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "हम भी डरे हुए हैं, लेकिन संकट की इस घड़ी में लोगों की मदद करना हमारा क्रांतिकारी कर्तव्य है. इसलिए हम अपने डर को उतारकर बाहर फेंक दिया है." अपनी प्रतिबद्धताओं के बारे में बताते हुए वो आगे कहते हैं, "जिसे डर नहीं लगता, वो सुपरहीरो होते हैं, लेकिन हम सुपरहीरोज़ नहीं हैं, हम क्रांतिकारी डॉक्टर्स हैं."


 


जीवन के सातवें दशक में जी रहे फर्नांडीज़ का ये आठवां अंतरराष्ट्रीय मिशन है. हर बार जब वो वतन छोड़कर निकलते हैं तो दुनिया किसी नई घातक बीमारी की चपेट में होती है. कोरोना से पहले वो इबोला से निपटने के लिए लाइबेरिया गए थे. इस वक़्त कोरोना का सबसे ज़्यादा असर इटली पर पड़ा है और डॉक्टर्स की इस टीम को लगता है कि इटली में अगर वो अपना काम सही से पूरा कर पाएं तो उनकी प्रतिबद्धता की ये मिसाल होगी. इसी टीम शरीक 64 साल के ग्रैसिलियानो डियाज़ ने रॉयटर्स को बताया, "मानवीय एकजुटता के सिद्धांत पर आधारित हम एक सम्मानित चुनौती को पूरा करने के लिए निकल पड़े हैं."



क्यूबा की स्वास्थ्य सेवा


क्यूबा की स्वास्थ्य सुविधा पूरी दुनिया के लिए मिसाल है. उसके सैकड़ों-हज़ारों डॉक्टर्स हर वक़्त विदेशों में इसी तरह की आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए हमेशा तैनात रहते हैं, फिर भी पूरी दुनिया में प्रति व्यक्ति डॉक्टर्स की उपलब्धता में क्यूबा चोटी के देशों में शुमार है. शनिवार को जब क्यूबा के 140 मेडिकल स्टाफ़ की टीम जमैका पहुंचा तो वहां के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, "संकट की इस घड़ी में क्यूबा सरकार और क्यूबा के अवाम ने जिस तरह हमारा साथ देने के लिए हाथ उठाया है वो बेमिसाल है." ब्रिटेन भी क्यूबा को इसी अंदाज़ में शुक्रिया कह चुका है. अमेरिका की तरफ़ से आर्थिक प्रतिबंध झेल रहे क्यूबा ने अभी भी हार नहीं मानी है और कोरोनावायरस की चुनौती से निपटने के लिए वो अमेरिका के ही मित्र-राष्ट्रों की मदद से नहीं हिचक रहा है.



आपातकालीन स्थितियों को छोड़ दीजिए, 2004 के बाद से क्यूबा ने 39 देशों में सिर्फ़ आंखों के मरीजों का इलाज किया है. किसी का ग्लूकोमिया ठीक किया है तो किसी मरीज का रेटीना री-अटैच्ड किया है. 'ऑपरेशन मिरैकल' के तहत वहां के डॉक्टर्स बाक़ी देशों की तुलना में इसके लिए हमेशा तैयार दिखते हैं.


देश का ऑटोमोवाइल सेक्टर जल्द ही सवसे वड़े हव के रूम में अपनी पहचान वनाएगा। यह दावा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने किया है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष में भारत का ऑटोमोवाइल क्षेत्र दुनिया में पहले नंवर पर पहुंच जाएगा।
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कोरोना हो या इबोला, दुनिया को याद आता है क्यूबा, क्या है इस देश के पास कि चीन, इटली, ब्रिटेन ने फैला दिए हाथ
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