होम्योपैथिक दवा 'आर्सेनिकम एल्बम 30' आपको कोरोनावायरस से क्या बचाएगी ?


 
















चीन से निकला कोरोना वायरस 81 देशों में फैल चुका है. भारत में इसके 28 केस सामने आए हैं. दुनियाभर के वैज्ञानिक और डॉक्टर इससे बचने के तरीके सुझा रहे हैं. लेकिन सोशल मीडिया के डॉक्टर अलग लेवल पर खेलते हैं. सोशल मीडिया और फेक न्यूज़ की दुनिया में एकदम अलग दवाईयां चलती हैं. वहां ऐसा दावा किया जा रहा है कि ‘आर्सेनिकम एल्बम 30’ नाम की होम्योपैथिक दवाई खाकर कोरोना वायरस से बचा जा सकता है.


सबसे ज़्यादा दुख की बात ये है कि इस झूठ की गंगोत्री स्वयं साक्षात भारत सरकार है. भारत सरकार ने 2014 में आयुष मंत्रालय गठन किया था. इस उम्मीद के साथ कि ये मंत्रालय आयुर्वेद, योग, नैचुरोपैथी, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी और सोवा रिगपा जैसी प्राचीन पद्धतियों को प्रमोट करेगा. लेकिन ये मंत्रालय कोरोना वायरस जैसे गंभीर मामले पर होम्योपैथी और यूनानी दवाईयां प्रिस्क्राइब कर रहा है.






 



PIB पर छपी एडवाइज़री. PIB सरकार की बातें लोगों तक पहुंचाने वाली एजेंसी है. (सोर्स – PIB)


कोरोना वायरस चीन में दिसंबर, 2019 से फैल रहा है. लेकिन दुनिया का ध्यान इसके ऊपर जनवरी, 2020 में गया. 30 जनवरी को इंडिया में कोरोना वायरस का पहला केस सामने आया. इससे ठीक एक दिन पहले यानी 29 जनवरी को आयुष मंत्रालय ने इस वायरस को लेकर एक एडवाइज़री जारी की. ये एडवाइज़री PIB यानी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के प्लेटफॉर्म पर छपी थी. इस एडवाइज़री में यूनानी दवाईयों की एक लंबी लिस्ट छपी है. कुछ आयुर्वेदिक दवाओं के नाम भी हैं. लेकिन ये सब वायरल नहीं हुआ.


इसी एडवाइज़री के एक पैराग्राफ में आर्सेनिकम एल्बम 30 का ज़िक्र है. इस दवा के लिए लिखा गया है –



28 जनवरी को आयुष मंत्रालय के कहने पर CCRH यानी Central Council for Research in Homoeopathy की एक मीटिंग बुलाई गई. और होम्योपैथी के ज़रिए कोरोना वायरस इन्फेक्शन से बचने के तरीकों पर चर्चा हुई. ये साइंटिफिक एडवाइज़री बोर्ड की 64वीं मीटिंग थी. एक्सपर्ट्स ने यहां ये सुझाव दिया कि आर्सेनिकम एल्बम 30 नाम की दवा लेकर कोरोना वायरस से बचा जा सकता है. तीन दिन तक रोज़ाना खाली पेट इस दवा का एक डोज़ लेना है. अगर फिर भी लोगों के बीच ये फैल रहा हो तो एक महीने बाद दोबारा लेना.



होम्योपैथी के बारे आप पहली लाइन पढ़ेंगे तो आपको उसमें बिलीफ या स्यूडोसाइंस जैसे शब्द ज़रूर मिलेंगे. स्यूडोसाइंस मतलब छद्मविज्ञान. मतलब जो चीज़ें पेश तो ऐसे की जाती हैं जैसे वो वैज्ञानिक हों लेकिन वो साइंटिफिक मैथड फॉलो नहीं करतीं.


ये भी ज़रूरी नहीं है कि किसी ड्रग पर होम्योपैथी का टैग लग जाए, तो उसके वैज्ञानिक आधार की गुंजाइश ही न बचे. इसलिए आर्सेनिकम एल्बम 30 का वैज्ञानिक आधार तलाशा गया. ऑल्ट न्यूज़ की सुमैया शेख ने इसकी पड़ताल की. और ऐसी कोई भी स्टडी नहीं मिली जिसमें कोरोना वायरस और आर्सेनिकम एल्बम 30 का नाता हो. बल्की कोरोना वायरस और किसी भी होम्योपैथिक दवा का रिश्ता बताने वाली भी कोई स्टडी नहीं है.


इस दवा की मेडिसिनल प्रॉपर्टीज़ बताने वाला केवल एक रिसर्च पेपर मिला जिसे. इसे ब्रिटिश होम्योपैथिक जर्नल में पब्लिश किया गया था. इस पेपर में आर्सेनिकम के बछड़ों में होने वाले डायरिया पर प्रभाव बताए गए थे. 2003 में ये स्टडी भी स्टेटेस्टिकली गलत निकली.


पता नहीं CCRH ने कोरोना वायरस को लेकर कोई स्टडी की भी है या नहीं? अगर की है तो वह कहां छपी है? उन्हें पूरी दुनिया के साथ अपने रिसर्च पेपर्स सांझा करने चाहिए ताकि कोरोना वायरस की वैक्सीन पर पसीना बहा रहे डॉक्टर्स को थोड़ी मदद मिल सके.


आप सोच रहे होंगे कि इस एडवाइज़री का कोई नतीजा नहीं निकला होगा. लेकिन देखिए कहीं आपके फैमिली ग्रुप में इस दवाई का नाम तो नहीं? ज़मीन पर नतीजा ये है कि तेलंगाना का आयुष विभाग पोस्टर लगाकर ये दवा बांट रहा है. अधिकारियों के मुताबिक, 3 मार्च तक 3500 लोगों को ये दवा दी गई. सोचिए अगर इन हज़ारों में से किसी एक को भी कोरोना वायरस इन्फेक्शन हो जाता है, और वो होम्योपैथिक दवाई के भरोसे चैकअप कराने नहीं जाता है, तो वो कितनों के लिए खतरा बन सकता है? फिर क्या आयुष मंत्रालय अपनी इस गलती की ज़िम्मेदारी लेगा?





 




वैसे तो आयुष मंत्रालय ने कुछ ढंग के प्रिवेंटिव मेज़र्स भी लिखे हैं. जैसे कि पर्सनल हाईजीन मेन्टेन करना, मास्क पहनना, हाथ धोना, आसपास के लोगों से दूरी बनाकर रखना. लेकिन ऊल-जुलूल और बिना वैज्ञानिक आधार की बातें लिखने से बचा जा सकता था. उन्हें ये पता होना चाहिए कि कोरोना वायरस इन्फेक्शन एक गंभीर समस्या है. और अब भारत में इसके कई केसेस आ चुके हैं. ऐसे में बेस्ट हैल्थ प्रेक्टिसेस को लेकर जागरूकता फैलाई जानी जानी चाहिए, न कि अंड-बंड दवाओं के पर्चे.


हालांकि मंत्रालय ने बाद में अपनी बात को लेकर सफाई दी. उन्होंने कहा कि हमने इन दवाओं से ‘इफेक्टिव ट्रीटमेंट’ का दावा नहीं किया है.


आप भी ध्यान रखें कि सर्दी-खांसी की किसी आम दवा को कोरोना वायरस का इलाज न समझें. खांसी, छींक, बुखार कोरोना वायरस के लक्षण हैं. ये वायरस से लड़ने का हमारे शरीर का अपना डिफेंस मैकेनिज़्म है. हो सकता है कोई दवा इन लक्षणों से छुटकारा भी दे दे. लेकिन लक्षणों से छुटकारा पाना और वायरस से छुटकारा पाना दो अलग बातें हैं.


वायरस को खत्म करने के लिए एंटीवायरल या वैक्सीन की ज़रूरत होगी. दुनियाभर के वैज्ञानिक वैक्सीन बनाने में लगे हुए हैं. कई जगहों पर वैक्सीन के जुगाड़ू तरीके भी अपनाए जा रहे हैं. फिलहाल कोरोना वायरस की एक कारगर वैक्सीन तैयार नहीं हुई है. तब तक सावधानी बरतना ही इससे बचने का सबसे बढ़ियां तरीका है.